सोमवार, 6 जून 2011
राजनीति जीती, जनता हारी
जेपी आंदोलन के लंबे समय बाद पूरा देश भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर एकजुट होता दिखाई दिया। अन्ना के आंदोलन में दिल्ली और मुंबई की सड़कों पर युवाओं का सैलाब उतर आया तो सरकार बैकफुट पर आ गई। राजनीति बाजी चली। अन्ना के साथ समझौता किया। अनशन तुड़वाया। अब बातचीत में कोई निष्कर्ष नहीं निकल रहा। अन्ना बार-बार दिल्ली आते हैं और बेनतीजा वार्ता निपट जाती है। सत्ता चलाने वाले हुक्मरां अभी जनता के हाथ में लोकपाल का हथियार नहीं देना चाहते। अन्ना और उनके सहयोगी फिर अनशन की हुंकार भर रहे हैं। उधर हरिद्वार से दिल्ली आकर अनशन का दम भरने वाले रामदेव को राजनेताओं ने वापिस हरिद्वार भेज दिया है। सत्याग्रह के सहार अंग्रेजों को खदेड़ने वाले गांधी के अनुयायियों (कांग्रेस) ने देर रात सत्याग्रह का दमन कर दिया। पहले चिठ्टी में रामदेव फंसे तो फिर गिरफ्तारी के बाद आंदोलन टूट गया। साठ साल से भ्रष्ट तंत्र की जड़ें पाताल तक पहुंची हैं। ये एक अनशन से नहीं उखड़ने वाली। उधर भाजपा भी राजनैतिक लाभ की चाह नहीं रोक पाई। उसके बड़े नेता रात भर झूमते रहे। जनता भूख और भ्रष्टाचार से त्रस्त है। उसका गुस्सा कभी अन्ना के आंदोलन में दिखता है तो कभी रामदेव के अनशन में। बार-बार जनता को राजनेताओं ने ठगा है। अब नेताओं पर विश्वास नहीं रहा तो वो सामाजिक कार्यकर्ताओं और योग गुरू में उम्मीद तलाश रही है, लेकिन राजनेता चतुर हैं। उन्होंने पूर आंदोलन की दिशा ही मोड़ दी है। भ्रष्टाचार के हमाम में सभी दल नंगें हैं। ऐसे में ड्रामा चल रहा है। वोट के गणित को ध्यान में रखकर रणनीति तैयार हो रही है। देखते हैं सियासत का ये भ्रष्ट सफर कितना लंबा चलता है।
राजनीति जीती, जनता हारी
जेपी आंदोलन के लंबे समय बाद पूरा देश भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर एकजुट होता दिखाई दिया। अन्ना के आंदोलन में दिल्ली और मुंबई की सड़कों पर युवाओं का सैलाब उतर आया तो सरकार बैकफुट पर आ गई। राजनीति बाजी चली। अन्ना के साथ समझौता किया। अनशन तुड़वाया। अब बातचीत में कोई निष्कर्ष नहीं निकल रहा। अन्ना बार-बार दिल्ली आते हैं और बेनतीजा वार्ता निपट जाती है। सत्ता चलाने वाले हुक्मरां अभी जनता के हाथ में लोकपाल का हथियार नहीं देना चाहते। अन्ना और उनके सहयोगी फिर अनशन की हुंकार भर रहे हैं। उधर हरिद्वार से दिल्ली आकर अनशन का दम भरने वाले रामदेव को राजनेताओं ने वापिस हरिद्वार भेज दिया है। सत्याग्रह के सहार अंग्रेजों को खदेड़ने वाले गांधी के अनुयायियों (कांग्रेस) ने देर रात सत्याग्रह का दमन कर दिया। पहले चिठ्टी में रामदेव फंसे तो फिर गिरफ्तारी के बाद आंदोलन टूट गया। साठ साल से भ्रष्ट तंत्र की जड़ें पाताल तक पहुंची हैं। ये एक अनशन से नहीं उखड़ने वाली। उधर भाजपा भी राजनैतिक लाभ की चाह नहीं रोक पाई। उसके बड़े नेता रात भर झूमते रहे। जनता भूख और भ्रष्टाचार से त्रस्त है। उसका गुस्सा कभी अन्ना के आंदोलन में दिखता है तो कभी रामदेव के अनशन में। बार-बार जनता को राजनेताओं ने ठगा है। अब नेताओं पर विश्वास नहीं रहा तो वो सामाजिक कार्यकर्ताओं और योग गुरू में उम्मीद तलाश रही है, लेकिन राजनेता चतुर हैं। उन्होंने पूर आंदोलन की दिशा ही मोड़ दी है। भ्रष्टाचार के हमाम में सभी दल नंगें हैं। ऐसे में ड्रामा चल रहा है। वोट के गणित को ध्यान में रखकर रणनीति तैयार हो रही है। देखते हैं सियासत का ये भ्रष्ट सफर कितना लंबा चलता है।
बुधवार, 19 मई 2010
दंतेवाड़ा के जख्म
असहाय चिदंबरम। खामोश मनमोहन। यूपी दौरे पर राहुल और सोनिया। छुट्टी मना रहे हैं गडकरी। भाजपा में गुटबाजी और वामपंथियों की चुप्पी, लेकिन दंतेवाड़ा में शहीद हुए लोगों के परिजन जबाव चाहते हैं। यह खामोशी तूफान का अंदेशा देती है। आखिर हुक्मरां चाहते क्या हैं? क्यों नक्सली समस्या के खात्मे के रास्ते नहीं तलाशे जाते? जवानों के खून पर आखिर कब तक राजनीति होगी?
दंतेवाड़ा में दो-दो बार खून बहा है। गृहमंत्री हाथ खड़े कर चुके हैं। मुख्य विपक्षी दल झारखंड़ में सत्ता का रास्ता निकल रहा है। राहुल मिशन यूपी पर सवार हैं तो माया और मुलायम एक-दूसरे पर वार करने में लगे हैं। ममता बनर्जी तो शायद इसके लिए भी दंतेवाड़ा जाने वालों को ही जिम्मेदार ठहराएं। वे पहले ही रेलवे स्टेशन की भगदड़ पर ऐसा कर चुकी हैं। देश के बारे में कौन सोचेगा? भूख और गरीबी से जूझ रही जनता को नक्सल और आतंकवाद के सामने खुला छोड़ दिया गया है। जनता बेचैन है, लेकिन दिल्ली ने खामोश चादर ओढ़ ली है। लगता है अभी देश की सियासत को कई रंग देखने हैं।
दंतेवाड़ा में दो-दो बार खून बहा है। गृहमंत्री हाथ खड़े कर चुके हैं। मुख्य विपक्षी दल झारखंड़ में सत्ता का रास्ता निकल रहा है। राहुल मिशन यूपी पर सवार हैं तो माया और मुलायम एक-दूसरे पर वार करने में लगे हैं। ममता बनर्जी तो शायद इसके लिए भी दंतेवाड़ा जाने वालों को ही जिम्मेदार ठहराएं। वे पहले ही रेलवे स्टेशन की भगदड़ पर ऐसा कर चुकी हैं। देश के बारे में कौन सोचेगा? भूख और गरीबी से जूझ रही जनता को नक्सल और आतंकवाद के सामने खुला छोड़ दिया गया है। जनता बेचैन है, लेकिन दिल्ली ने खामोश चादर ओढ़ ली है। लगता है अभी देश की सियासत को कई रंग देखने हैं।
बुधवार, 5 मई 2010
खेल संघों की जंग

खेल संघों को लेकर जंग जारी है। अपनी कुर्सी बचाने के लिए संघ पदाधिकारी एक मंच पर आ गए हैं। काश कभी खेलों के लिए ऐसी एकजुटता देखने को मिलती तो भारतीय खेलों की हालत कुछ और होती। लंबे समय से कुर्सी पर काबिज राजनीतिज्ञ और नौकरशाह हो-हल्ला कर रहे हैं। आखिर उन्हें खेल संघों की कुर्सी क्यों चाहिए? दरअसल सालों से खेलों के नाम पर उनका विकास हो रहा है।क्रिकेट बोर्ड तो दुनिया का सबसे ज्यादा पैसे वाली संस्था है, लेकिन दूसरे खेल संघों में भी खेलों के नाम पर घपला कम नहीं है। तभी तो कलमाड़ी, गिल और मल्होत्रा जैसे लोग प्रधानमंत्री से गुहार लगा रहे हैं। भारत में पैसे के अभाव में प्रतिभा दम तोड़ देती हैं और दूसरी तरफ खेलसंघों के नाम पर नौकशाह और नेता ऐश कर रहे हैंं। कोर्ट का फैसला स्वागत योग्य है और सभी को उसका स्वागत करना चाहिए।अब थोड़ी सी गंभीर कोशिश खेलों को सुधारने की भी हो जाए।
गुरुवार, 29 अप्रैल 2010
बंदूक और विकास
नक्सलवाद को लेकर देश में हो-हल्ला हो रहा है। पक्ष और विपक्ष सभी इस मामले में एकजुट है। सभी चाहते हैं कि नक्सल प्रभावित इलाकों में सख्त कार्रवाई हो। कुछ तो हवाई हमले के भी पक्षधर है, लेकिन हम सभी समस्या के मूल से बहुत पीछे हट रहे हैं। देश का आम नागरिक होने के बाद भी आदिवासियों को उनका हक नहीं मिला। जल, जंगल और जमीन के लिए वे संघर्ष कर रहे हैं। नक्सली उनके बीच जाकर काम करते हैं और हम एअर कंडीशन कमरों में बैठकर कार्रवाई के बारे में सोचते हैं। तमाम आतंकी वारदातों के बाद भी हम पाक के सात वार्ता करते हैं, लेकिन नक्सलियों के मामले में ऐसा नहीं है। देश के भटके हुए युवा को मुख्यधारा में जोडऩे का प्रयास करना चाहिए। आदिवासियों को चिंता है कि उनके संसाधन कारपोरेट घरानों को सौंप दिए जाएंगे। यह चिंता वाजिब है। देश में निजीकरण का दौर है और प्राकृतिक संसाधनों को कब्जाने की जंग जारी है।ऐसे में नक्सली आदिवाशियों को यही डर दिखाते हैं। नक्सलवाद का खात्मा बंदूक नहीं विकास से हो सकता है।गांधी के देश में उनके ही सिद्धातों को भुला दिया गया। भगवान राम भी वनवासियों के बीच चौदह साल रहे और उन्हें मुख्यधारा में जोड़ा तो फिर आज के हुक्मरां ग्रीन हंट पर भरोसा क्यों कर रहे हंै? कहीं इसके पीछे भी मल्टीनेशनल कंपनियों का दिमाग तो नहीं? देश को जनता को जानने का हक है कि आखिर इस समस्या से निपटने का सरकार के पास क्या हल है? वक्त आ गया है कि सभी राजनैतिक दलों को इस मामले पर अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
आईपीएल-इंडियन पैसा लीग

आईपीएल के उठे विवाद ने क्रिकेट जगत में तूफान ला दिया है। एक केंद्रीय मंत्री को जाना पड़ा तो आईपीएल चेयरमैन की विदाई पटकथा लिखी जा चुकी है। पैसा, पावर और ग्लैमर के घालमेल ने
आईपीएल में क्रिकेट का नया रूप दिखाया है। बाजार इस खेल के नियम तय कर रहा है। खेल को अपने तरीकों से बाजार ने बदल दिया। यह बाजार का जलवा है कि मैथू हैडन के हाथ में मंगूज बल्ला नजर आता है। वालीवुड की तमाम सुंदरियां आईपीएल मैचों में नजर आती हंै। देश के बड़े-बड़े उद्योगपति मैदान के बाहर ताली बजा रहे हैं। लिकर किंग विजय माल्या, उद्योगपति मुकेश अंबानी टीमों का हौंसला बढ़ा रहे हैं। उधर ग्लैमर का तड़का भी कुछ कम नहीं है। शिल्पा शेट्टी, शहारुख खान, प्रिटी जिंटा सभी दल-बल के साथ मैदान पर हाजिर हंै। दरअसल यह क्रिकेट की दीवानगी नहीं है।क्रिकेट तो पहले भी खेला जाता था, तब माल्या और अंबानी नजर नहीं आते थे। यह क्रिकेट का बाजार है। करोडों के वारे-न्यारे हो रहे हैं। ऐसे में यहां भ्रष्टाचार की दलदल होना लाजमी था। आईपीएल केवल खेल नहीं रहा, व्यापार हो गया है। नेताओं का कालाधन इसमे लगा है। बीते बीस सालों में क्रिकेट में अकूत धन आया है। सभी प्रदेशों के क्रिकेट बोर्डों पर नजर डालें तो सत्ताधारी दलों का कब्जा है। अब क्रिकेट दुधारू गाय है और सभी उसे दुहना चाहते हैं। थरुर और मोदी तो केवल एक उदाहरण है। इस हमाम में सभी नंगे हैं। यह तो केवल शुरुआत है। अभी तो हमें बड़े-बड़े खुलासों का सामना करना है। थुरुर के मामले में साफ है कि राजनेता किस तरह आर्थिक हितों को प्रभावित करते हैं। जनता के तथाकथित सेवकों के एक इशारे पर करोड़ों की सौगात मिल जाती है। अब आईपीएल से सट्टेबाजी की बू भी आ रही है। अगर जांच सही तरह हुई( जिसकी कम संभावना है) तो कई बड़ों की गर्दन फंसती नजर आएगी। तीसरा सीजन पूरा होते-होते मोदी की विदाई तय हो गई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या पूरे मामले पर चुप्पी साधे बैठे रहे बीसीसीआई और सरकार का दामन पाक-साफ है। अब तो आईपीएल के छींटे शरद पवार पर भी पड़ रहे हैं। देखते हैं कि इंडियन पैसा लीग का यह ऊंट किस करवट बैठता है।
----- गौरव त्यागी

आईपीएल के उठे विवाद ने क्रिकेट जगत में तूफान ला दिया है। एक केंद्रीय मंत्री को जाना पड़ा तो आईपीएल चेयरमैन की विदाई पटकथा लिखी जा चुकी है। पैसा, पावर और ग्लैमर के घालमेल ने
आईपीएल में क्रिकेट का नया रूप दिखाया है। बाजार इस खेल के नियम तय कर रहा है। खेल को अपने तरीकों से बाजार ने बदल दिया। यह बाजार का जलवा है कि मैथू हैडन के हाथ में मंगूज बल्ला नजर आता है। वालीवुड की तमाम सुंदरियां आईपीएल मैचों में नजर आती हंै। देश के बड़े-बड़े उद्योगपति मैदान के बाहर ताली बजा रहे हैं। लिकर किंग विजय माल्या, उद्योगपति मुकेश अंबानी टीमों का हौंसला बढ़ा रहे हैं। उधर ग्लैमर का तड़का भी कुछ कम नहीं है। शिल्पा शेट्टी, शहारुख खान, प्रिटी जिंटा सभी दल-बल के साथ मैदान पर हाजिर हंै। दरअसल यह क्रिकेट की दीवानगी नहीं है।क्रिकेट तो पहले भी खेला जाता था, तब माल्या और अंबानी नजर नहीं आते थे। यह क्रिकेट का बाजार है। करोडों के वारे-न्यारे हो रहे हैं। ऐसे में यहां भ्रष्टाचार की दलदल होना लाजमी था। आईपीएल केवल खेल नहीं रहा, व्यापार हो गया है। नेताओं का कालाधन इसमे लगा है। बीते बीस सालों में क्रिकेट में अकूत धन आया है। सभी प्रदेशों के क्रिकेट बोर्डों पर नजर डालें तो सत्ताधारी दलों का कब्जा है। अब क्रिकेट दुधारू गाय है और सभी उसे दुहना चाहते हैं। थरुर और मोदी तो केवल एक उदाहरण है। इस हमाम में सभी नंगे हैं। यह तो केवल शुरुआत है। अभी तो हमें बड़े-बड़े खुलासों का सामना करना है। थुरुर के मामले में साफ है कि राजनेता किस तरह आर्थिक हितों को प्रभावित करते हैं। जनता के तथाकथित सेवकों के एक इशारे पर करोड़ों की सौगात मिल जाती है। अब आईपीएल से सट्टेबाजी की बू भी आ रही है। अगर जांच सही तरह हुई( जिसकी कम संभावना है) तो कई बड़ों की गर्दन फंसती नजर आएगी। तीसरा सीजन पूरा होते-होते मोदी की विदाई तय हो गई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या पूरे मामले पर चुप्पी साधे बैठे रहे बीसीसीआई और सरकार का दामन पाक-साफ है। अब तो आईपीएल के छींटे शरद पवार पर भी पड़ रहे हैं। देखते हैं कि इंडियन पैसा लीग का यह ऊंट किस करवट बैठता है।----- गौरव त्यागी
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010
बदल रही है हिंदी, अचरज कैसा
भाषा पर मेरे लेख को लेकर कुछ मित्रों ने आपत्ति जताई है। मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मेरा मुख्य विषय भाषा था। केवल हिंदी नहीं। दरअसल मैं वैश्वीकरण के दौर में तमाम भाषाओं के बारे में बात कर रहा था। जहां तक हिंदी का सवाल है तो बाजार के चलते हिंदी का विकास तय है। नब्बे के बाद बाजार भाषा ही नहीं रिश्तों को भी तय कर रहा है। ऐसे में हिंदी के भविष्य को लेकर मैं यह लेख लिख रहा है। उम्मीद है कि मेरे मित्रों की जिज्ञाषा का कुछ समाधान होगा। मैं यह भी स्पष्ट कर रहा हूं कि मैं कोई भाषा शास्त्री नहीं हूं। मैं संचार माध्यमों से जुड़ा आदमी हूं। ऐसे में संचार की भाषा इस्तेमाल करने का प्रयास करता हूं।
बदल रही है हिंदी, अचरज कैसा
मानव सभ्यता के विकास में आदमी ने तरह-तरह के अविष्कार किए हैं। इन अजब खोजों के सहारे उसने जीवन की विकास यात्रा को परवान चढ़ाया है तो जिंदगी को आसान भी किया है। आदमी के बनाए हथियारों में सबसे अहम है भाषा। इसने आदमी की बौद्धिक उन्नति का रास्ता बनाया। भाषा ने पुल का काम किया है। संवाद जोड़ता है। भाषा हमारे बीच का दरवाजा है, जिसके सहारा एक-दूसरे की भावनाओं को अभिव्यक्त किया जाता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सभ्यताओं के विकास के साथ-साथ भाषाओं का विकास हुआ। विकास के इस क्रम से हिंदी भी अछूती नहीं है। भूमंडलीकरण के दौर में सूचना और प्रौद्योगिकी के विस्तार ने हिंदी को मजबूत किया है।
आर्थिक नीतियों के चलते देश में नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण की बयार चली। बाजार ने तमाम पहलुओं को प्रभावित किया। वैश्वीकरण ने देश के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र को प्रभावित किया है। हिंदी भी इससे अछूती नहीं है। पहले शंका जाहिर की गई कि शायद वैश्वीकरण का यह पहियां हिंदी के लिए घातक साबित होगा, लेकिन हिंदी का बाजार उसके लिए वरदान बनकर खड़ा हो गया। बाजार की ताकत है कि हिंदी का जो विकास शासन से नहीं हो सका, वह भूमंडलीकरण के चलते हुआ। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास ने भाषा के लिए नए रास्ते खोल दिए। इंटरनेट पर अंग्रेजी के साम्राज्य को हिंदी चुनौती दे रही है। भूमंडलीकरण के बाद देश में हिंदी चैनल्स की बाढ़ सी आ गई। आज हिंदी सैटेलाइट पर सवार है। तकनीक के विकास के साथ हिंदी का रास्ता आसान हो गया। घरों में चलते टीवी, अखबार, रेडियो, अंतरिक्ष में तैरते सैटेलाइट हिंदी को बढ़ा रहे हैं। तकनीकी विकास ने प्रसार को आसान कर दिया है। सूचनाएं सेकेंडों में इधर से उधर घूम रही हैं।
कंप्यूटर और इंटरनेट आने पर समझा जा रहा था कि अब शायद अंग्रेजियत का दौर आ गया है, लेकिन ऐसा नहीं है। इसने धीरे-धीरे हिंदी की चाल चलना शुरू कर दिया है। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में 42 करोड लोगों की भाषा हिंदी है। इस बाजार को लेकर नेट और कंप्यूटर पर हिंदी छाने लगी है। अंग्रेजी के अखबारों में हिंदी के शब्द रोमन में मिलते हैं तो कई बार विज्ञापन की भाषा हिंदी होती है। मतलब साफ है कि हिंदी के बाजार के चलते वह अपनी जगह बना रही है। केवल तीन साल पहले इंटरनेट पर हिंदी के ब्लाग की संख्या सात सौ थी, यह आज बढ़कर बीस हजार पहुंच गई है। आने वाले दो सालों में विशेषज्ञ इसके लाख का आंकड़ा पार करने का अनुमान लगा रहे हैं। हिंदी के चाहने वाले ब्लाग के सहारे भाषा का विकास कर रहे हैं। भारत ही नहीं विदेशों में भी हिंदी ब्लागों को पढ़ा और सराहा जाता है। ट्विटर पर हिंदी के इस्तेमाल के लिए मांग उठने लगी है। एनडीटीवी के पंकज पचौरी भी इसकी मांग उठा चुके हैं। एप्पल कंपनी को हिंदी एप्लीकेशन के लिए बार-बार लिखा जा रहा है। आशा है कि जल्द ही कंप्यूटर के तमाम एप्लीकेशन हिंदी में होंगे।
भारत में पांच करोड से ज्यादा इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले हैं। यूनीकोड के सहारे आप विंडोज 2000 या उससे ऊपर के संस्करण में टेक्सट टाइप कर सकते हैं। गूगल ने अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद की सुविधा दे दी है। इस तकनीकी विकास से हिंदी वालों को सहूलियत हुई है। कुछ मित्रों ने हिंदी-विमर्श नाम से एक मंच बनाया है। इस पर ईमेल के माध्यम से हिंदी की तकनीकी समस्याओं का समाधान किया जाता है। यहंा हिंदी में हो रहे तकनीकी विकास को बताया जाता है। आप हिंदी के संबंध में कोई भी तकनीकी जिज्ञासा इस मंच पर हल कर सकते हैं। यह सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के चलते संभव हो पाया है।
आज दुनिया तेजी के साथ बदल रही है। इस तेज दौर में नई तकनीक ने हिंदी के विकास में योगदान दिया है। करीब सत्तर साल पहले दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भाषा की दिक्कत आई। मित्र देश की सेनाओं में पूरी दुनिया के सैनिक थे। अलग-अलग देशों से आए ये सैनिक भाषा के स्तर पर अलग-अलग थे। एक आदेश को उन तक कैसे पहुंचाया जाए? यह बड़ा सवाल था। तब पहली बार आवश्यक वाक्यों का अनुवाद किया गया। भाषा विशेषज्ञों ने जंग--ए-मैदान के लिए अनुवाद की राह तलाश की। यह मशीनी अनुवाद की दिशा में उठा पहला कदम था। मित्र देशों के सैनिकों तक मशीनी अनुवाद के सहारे संदेश फटाफट पहुंचने लगे। 2007 में जब जापान के प्रधानमंत्री सिंजो आबे जापानी में भाषण दे रहे थे। उनके हाथ में एक गैजेट था। यह उपकरण उनकी बात को इंग्लिश और चीनी भाषा में अनूदित कर रहा था। यह उपकरण क्योटो की एक कंपनी ने बनाया। पहले-पहल इस तरह के गैजेट जापानी और चीनी भाषा में बनाए गए। अब हिंदी में भी इस तरह के गैजेट बनाने पर काम चल रहा है। आईआईआईटी हैदराबाद ने मशीन ट्रांसलेशन सिस्टम बनाया है। इसे उन्होंने शक्ति नाम दिया है। इस अनुवाद को करने में चौबीस पेज पर काम करना पड़ता है, लेकिन कंप्यूटर पर यह बिजली की गति से अनुवाद करता है। गूगल ने अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद शुरू कर दिया है। अंग्रेजी में कोई भी वाक्य टाइप करने पर उसका हिंदी अनुवाद कंप्यूटर स्क्रीन पर आ जाता है। इतना तय है कि आने वाले समय में मशीनी अनुवाद की गति और रफ्तार पकड़ेगी और इससे हिंदी का भला होगा। तब अग्रेजी न आने का रोना नहीं रोया जाएगा। मशीन सेकेंडों में अग्रेजी वाक्यों का अनुवाद कर देगी।
हिंदी का सबसे ज्यादा विरोध दक्षिण के राज्यों में हुआ, लेकिन अब बाजार के चलते वहां भी हिंदी को पढ़ा जाता है। भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी की ताकत लगातार बढ़ रही है। 1995 में विश्व की पांच भाषाओं को मीडिया मुगल रुपर्ट मर्डोक ने भविष्य की ताकतवर भाषा बताया था, उसमे हिंदी शामिल है। मर्डोक हिंदी के इस बाजार की ताकत को पहले ही समझ गए थे और उन्होंने इसे भुनाने की तैयारी भी कर दी थी। हिंदी को लेकर शुद्धतावाती खूब हल्ला मचाते हैं। वे बाजार का विरोध भी करते हैं, लेकिन इतना तय है कि हिंदी का लाभ बाजार के विस्तार से हुआ है। इंटरनेट पर लगातार बढ़ते ब्लाग, हिंदी में हो रहे काम, बढ़ता समाचार पत्रों का दायरा, हिंदी के विस्तार का सूचक है।
हिंदी को जो लोकतंत्र नहीं दे पाया, वह बाजार ने दिया है। हिंदी के क्षेत्रीय मीडिया की तरक्की, इलेक्ट्रानिक मीडिया का विस्तार, एफएम का फैलाव, नेट पर खुलती हिंदी साइटें और ब्लाग। टीवी की दुनिया में हिंदी चैनल को ही मुनाफे की नजर से कामयाब बताया गया है। एफएम चैनल हिंदी में हैं। हिंदी का प्रकाशन उद्योग लंबे समय से जड़ता का शिकार रहा, लेकिन अब इसमे ताजगी की लहर है। पेंग्विन, पीयर्सन, एज्यूकेशन और प्रेटिंस हाल जैसे कुछ प्रकाशन हिंदी के पुस्तक बाजार में कूद पड़े हैं। अमेरिका के 75 कॉलेजों और 45 विश्वविद्यालयों में करीब 1500 छात्र हिंदी में दाखिला लेते हैं। मतलब साफ है कि हिंदी का बाजार भाव है। इसे विदेशी भी मान रहे हैं।
पिछले दशक में हिंदी के क्षेत्र में बड़ी क्रांति हुई। अरविंद कुमार ने थिसायरस की रचना की। अब तो उनका बाइलिंग्वल भी छपकर आ गया है। इस थियारस को उन्होंने करीब बीस साल में तैयार किया है। थिसारस की रचना में तकनीक भी शामिल है। अरविंद कुमार कार्डों पर शब्द नोट करते थे। बाद में उन्होंने एक कंप्यूटर खरीदा और उस पर इन शब्दों का संग्रह इक्ठ्ठा किया। इस कंप्यूटर खरीद के लिए उनके बेटे को विदेश भी जाना पड़ा, लेकिन हिंदी के क्षेत्र में बड़ा काम हो गया। अरविंद कुमार कहते हैं कि आज हिंदी फल-फूल रही है। सूचना प्रौद्योगिकी ने हिंदी को आसान कर दिया है। दरअसल भाषा आम जन की होती है। यह प्रयोगशाला में नहीं गढ़ी जाती। जनता अपनी भाषा खुद बनाती है और आज की पीढ़ी अपने हिसाब से हिंदी को तैयार कर रही है तो अचरज कैसा? हम सबकों हिंदी के इस विकास और विस्तार का स्वागत करना चाहिए। रोज हिंदी में शब्दों की संख्या बढ़ रही है। अपने विस्तार में हिंदी का सहारा लेकर ताकतवर बना बाजार अब हिंदी को भी शक्तिशाली बना रहा है। यह ताकत ही है कि हिंदी को लेकर अंगरेजी दां लोगों तक का रवैया बदलता नजर आ रहा है। आने वाले दिनों में हिंदी का विकास तय है।
बदल रही है हिंदी, अचरज कैसा
मानव सभ्यता के विकास में आदमी ने तरह-तरह के अविष्कार किए हैं। इन अजब खोजों के सहारे उसने जीवन की विकास यात्रा को परवान चढ़ाया है तो जिंदगी को आसान भी किया है। आदमी के बनाए हथियारों में सबसे अहम है भाषा। इसने आदमी की बौद्धिक उन्नति का रास्ता बनाया। भाषा ने पुल का काम किया है। संवाद जोड़ता है। भाषा हमारे बीच का दरवाजा है, जिसके सहारा एक-दूसरे की भावनाओं को अभिव्यक्त किया जाता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सभ्यताओं के विकास के साथ-साथ भाषाओं का विकास हुआ। विकास के इस क्रम से हिंदी भी अछूती नहीं है। भूमंडलीकरण के दौर में सूचना और प्रौद्योगिकी के विस्तार ने हिंदी को मजबूत किया है।
आर्थिक नीतियों के चलते देश में नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण की बयार चली। बाजार ने तमाम पहलुओं को प्रभावित किया। वैश्वीकरण ने देश के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र को प्रभावित किया है। हिंदी भी इससे अछूती नहीं है। पहले शंका जाहिर की गई कि शायद वैश्वीकरण का यह पहियां हिंदी के लिए घातक साबित होगा, लेकिन हिंदी का बाजार उसके लिए वरदान बनकर खड़ा हो गया। बाजार की ताकत है कि हिंदी का जो विकास शासन से नहीं हो सका, वह भूमंडलीकरण के चलते हुआ। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास ने भाषा के लिए नए रास्ते खोल दिए। इंटरनेट पर अंग्रेजी के साम्राज्य को हिंदी चुनौती दे रही है। भूमंडलीकरण के बाद देश में हिंदी चैनल्स की बाढ़ सी आ गई। आज हिंदी सैटेलाइट पर सवार है। तकनीक के विकास के साथ हिंदी का रास्ता आसान हो गया। घरों में चलते टीवी, अखबार, रेडियो, अंतरिक्ष में तैरते सैटेलाइट हिंदी को बढ़ा रहे हैं। तकनीकी विकास ने प्रसार को आसान कर दिया है। सूचनाएं सेकेंडों में इधर से उधर घूम रही हैं।
कंप्यूटर और इंटरनेट आने पर समझा जा रहा था कि अब शायद अंग्रेजियत का दौर आ गया है, लेकिन ऐसा नहीं है। इसने धीरे-धीरे हिंदी की चाल चलना शुरू कर दिया है। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में 42 करोड लोगों की भाषा हिंदी है। इस बाजार को लेकर नेट और कंप्यूटर पर हिंदी छाने लगी है। अंग्रेजी के अखबारों में हिंदी के शब्द रोमन में मिलते हैं तो कई बार विज्ञापन की भाषा हिंदी होती है। मतलब साफ है कि हिंदी के बाजार के चलते वह अपनी जगह बना रही है। केवल तीन साल पहले इंटरनेट पर हिंदी के ब्लाग की संख्या सात सौ थी, यह आज बढ़कर बीस हजार पहुंच गई है। आने वाले दो सालों में विशेषज्ञ इसके लाख का आंकड़ा पार करने का अनुमान लगा रहे हैं। हिंदी के चाहने वाले ब्लाग के सहारे भाषा का विकास कर रहे हैं। भारत ही नहीं विदेशों में भी हिंदी ब्लागों को पढ़ा और सराहा जाता है। ट्विटर पर हिंदी के इस्तेमाल के लिए मांग उठने लगी है। एनडीटीवी के पंकज पचौरी भी इसकी मांग उठा चुके हैं। एप्पल कंपनी को हिंदी एप्लीकेशन के लिए बार-बार लिखा जा रहा है। आशा है कि जल्द ही कंप्यूटर के तमाम एप्लीकेशन हिंदी में होंगे।
भारत में पांच करोड से ज्यादा इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले हैं। यूनीकोड के सहारे आप विंडोज 2000 या उससे ऊपर के संस्करण में टेक्सट टाइप कर सकते हैं। गूगल ने अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद की सुविधा दे दी है। इस तकनीकी विकास से हिंदी वालों को सहूलियत हुई है। कुछ मित्रों ने हिंदी-विमर्श नाम से एक मंच बनाया है। इस पर ईमेल के माध्यम से हिंदी की तकनीकी समस्याओं का समाधान किया जाता है। यहंा हिंदी में हो रहे तकनीकी विकास को बताया जाता है। आप हिंदी के संबंध में कोई भी तकनीकी जिज्ञासा इस मंच पर हल कर सकते हैं। यह सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के चलते संभव हो पाया है।
आज दुनिया तेजी के साथ बदल रही है। इस तेज दौर में नई तकनीक ने हिंदी के विकास में योगदान दिया है। करीब सत्तर साल पहले दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भाषा की दिक्कत आई। मित्र देश की सेनाओं में पूरी दुनिया के सैनिक थे। अलग-अलग देशों से आए ये सैनिक भाषा के स्तर पर अलग-अलग थे। एक आदेश को उन तक कैसे पहुंचाया जाए? यह बड़ा सवाल था। तब पहली बार आवश्यक वाक्यों का अनुवाद किया गया। भाषा विशेषज्ञों ने जंग--ए-मैदान के लिए अनुवाद की राह तलाश की। यह मशीनी अनुवाद की दिशा में उठा पहला कदम था। मित्र देशों के सैनिकों तक मशीनी अनुवाद के सहारे संदेश फटाफट पहुंचने लगे। 2007 में जब जापान के प्रधानमंत्री सिंजो आबे जापानी में भाषण दे रहे थे। उनके हाथ में एक गैजेट था। यह उपकरण उनकी बात को इंग्लिश और चीनी भाषा में अनूदित कर रहा था। यह उपकरण क्योटो की एक कंपनी ने बनाया। पहले-पहल इस तरह के गैजेट जापानी और चीनी भाषा में बनाए गए। अब हिंदी में भी इस तरह के गैजेट बनाने पर काम चल रहा है। आईआईआईटी हैदराबाद ने मशीन ट्रांसलेशन सिस्टम बनाया है। इसे उन्होंने शक्ति नाम दिया है। इस अनुवाद को करने में चौबीस पेज पर काम करना पड़ता है, लेकिन कंप्यूटर पर यह बिजली की गति से अनुवाद करता है। गूगल ने अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद शुरू कर दिया है। अंग्रेजी में कोई भी वाक्य टाइप करने पर उसका हिंदी अनुवाद कंप्यूटर स्क्रीन पर आ जाता है। इतना तय है कि आने वाले समय में मशीनी अनुवाद की गति और रफ्तार पकड़ेगी और इससे हिंदी का भला होगा। तब अग्रेजी न आने का रोना नहीं रोया जाएगा। मशीन सेकेंडों में अग्रेजी वाक्यों का अनुवाद कर देगी।
हिंदी का सबसे ज्यादा विरोध दक्षिण के राज्यों में हुआ, लेकिन अब बाजार के चलते वहां भी हिंदी को पढ़ा जाता है। भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी की ताकत लगातार बढ़ रही है। 1995 में विश्व की पांच भाषाओं को मीडिया मुगल रुपर्ट मर्डोक ने भविष्य की ताकतवर भाषा बताया था, उसमे हिंदी शामिल है। मर्डोक हिंदी के इस बाजार की ताकत को पहले ही समझ गए थे और उन्होंने इसे भुनाने की तैयारी भी कर दी थी। हिंदी को लेकर शुद्धतावाती खूब हल्ला मचाते हैं। वे बाजार का विरोध भी करते हैं, लेकिन इतना तय है कि हिंदी का लाभ बाजार के विस्तार से हुआ है। इंटरनेट पर लगातार बढ़ते ब्लाग, हिंदी में हो रहे काम, बढ़ता समाचार पत्रों का दायरा, हिंदी के विस्तार का सूचक है।
हिंदी को जो लोकतंत्र नहीं दे पाया, वह बाजार ने दिया है। हिंदी के क्षेत्रीय मीडिया की तरक्की, इलेक्ट्रानिक मीडिया का विस्तार, एफएम का फैलाव, नेट पर खुलती हिंदी साइटें और ब्लाग। टीवी की दुनिया में हिंदी चैनल को ही मुनाफे की नजर से कामयाब बताया गया है। एफएम चैनल हिंदी में हैं। हिंदी का प्रकाशन उद्योग लंबे समय से जड़ता का शिकार रहा, लेकिन अब इसमे ताजगी की लहर है। पेंग्विन, पीयर्सन, एज्यूकेशन और प्रेटिंस हाल जैसे कुछ प्रकाशन हिंदी के पुस्तक बाजार में कूद पड़े हैं। अमेरिका के 75 कॉलेजों और 45 विश्वविद्यालयों में करीब 1500 छात्र हिंदी में दाखिला लेते हैं। मतलब साफ है कि हिंदी का बाजार भाव है। इसे विदेशी भी मान रहे हैं।
पिछले दशक में हिंदी के क्षेत्र में बड़ी क्रांति हुई। अरविंद कुमार ने थिसायरस की रचना की। अब तो उनका बाइलिंग्वल भी छपकर आ गया है। इस थियारस को उन्होंने करीब बीस साल में तैयार किया है। थिसारस की रचना में तकनीक भी शामिल है। अरविंद कुमार कार्डों पर शब्द नोट करते थे। बाद में उन्होंने एक कंप्यूटर खरीदा और उस पर इन शब्दों का संग्रह इक्ठ्ठा किया। इस कंप्यूटर खरीद के लिए उनके बेटे को विदेश भी जाना पड़ा, लेकिन हिंदी के क्षेत्र में बड़ा काम हो गया। अरविंद कुमार कहते हैं कि आज हिंदी फल-फूल रही है। सूचना प्रौद्योगिकी ने हिंदी को आसान कर दिया है। दरअसल भाषा आम जन की होती है। यह प्रयोगशाला में नहीं गढ़ी जाती। जनता अपनी भाषा खुद बनाती है और आज की पीढ़ी अपने हिसाब से हिंदी को तैयार कर रही है तो अचरज कैसा? हम सबकों हिंदी के इस विकास और विस्तार का स्वागत करना चाहिए। रोज हिंदी में शब्दों की संख्या बढ़ रही है। अपने विस्तार में हिंदी का सहारा लेकर ताकतवर बना बाजार अब हिंदी को भी शक्तिशाली बना रहा है। यह ताकत ही है कि हिंदी को लेकर अंगरेजी दां लोगों तक का रवैया बदलता नजर आ रहा है। आने वाले दिनों में हिंदी का विकास तय है।
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